(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

आश्वमेधिकपर्व


॥ श्रीः ॥
14.62. अध्यायः 062
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Topics
वसुदेवादिभिरभिमन्यवे श्राद्धदानम्॥ 1 ॥ व्यासेन हास्तिनपुरमेत्य उत्तरादिपरिसान्त्वपूर्वकं युधिष्ठिरंप्रत्यश्वमेधसंचोदनेनि पुनरन्तर्धानम्॥ 2 ॥
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच।

एतच्छ्रुत्वा तु पुत्रस्य वचः शूरात्मजस्तदा।
विहाय शोकं धर्मात्मा ददौ श्राद्धमनुत्तमम्॥ 14-62-1(94233)
तथैव वासुदेवश्च स्वस्त्रीयस्य महात्मनः।
दयितस्यि पितुर्नित्यमकरोदौर्ध्वदेहिकम्॥ 14-62-2(94234)
षष्टिं शतसहस्राणि ब्राह्मणानां महौजसाम्।
विधिवद्भोजयामास भोज्यं सर्वगुणान्वितम्॥ 14-62-3(94235)
आच्छाद्य च महाबाहुर्धनतृष्णामपानुदत्।
ब्राह्मणानां तदा कृष्णस्तदभूद्रोमहर्षणम्॥ 14-62-4(94236)
सुवर्णं चैव गाश्चैव शयनाच्छादनानि च।
दीयमानं तदा विप्रः प्रभूतमिति चाब्रुवन्॥ 14-62-5(94237)
वासुदेवोऽथ दाशार्हो बलेदेवः ससात्यकिः।
अभिमन्योस्तदा श्राद्धमकुर्वन्सत्यकस्तदा।
अतीव दुःखसंतप्ता न शमं चोपलेभिरे॥ 14-62-6(94238)
तथैव पाण्डवा वीरा नगरे नागसह्वये।
नोपागच्छन्त वै शान्तिमभिमन्युविनाकृताः॥ 14-62-7(94239)
सुबहूनि च राजेन्द्र दिवसानि विराटजा।
नाभुङ्क्त पतिदुःखार्ता तदभूत्करुणं महत्॥ 14-62-8(94240)
धियमाणे तु तस्मिंस्तु गर्भे कुक्षिस्थ एव च।
आजगाम ततो व्यासो ज्ञात्वा दिव्येन चक्षुषा॥ 14-62-9(94241)
समागम्याब्रवीमान्पृथां पृथुललोचनाम्।
उत्तरां च महातेजाःइ शोकः संत्यज्यतामयम्॥ 14-62-10(94242)
जनिष्यते महातेजाः पुत्रस्तव यशस्विनि।
प्रभावाद्वासुदेवस्य मम व्याहरणादपि।
पाण्डवानामयं चान्ते पालयिष्यति मेदिनीम्॥ 14-62-11(94243)
धनञ्जयं च सम्प्रेक्ष्य धर्मराजस्य शृण्वतः।
व्यासो वाक्यमुवाचेदं हर्षयन्निव भारत॥ 14-62-12(94244)
पौत्रस्तव महाभागो जनिष्यति महामनाः।
पृथ्वीं सागरपर्यन्तां पालयिष्यति धर्मतः॥ 14-62-13(94245)
तस्माच्छोकं कुरुश्रेष्ठ जहि त्वमरिकर्शन।
विचार्यमत्र न हि ते सत्यमेतद्भविष्यति॥ 14-62-14(94246)
यच्चापि वृष्णिवीरेणि कृष्णेन कुरुनन्दन।
पुरोक्तं तत्तथा भावि मा तेऽत्रास्तु विचारणा॥ 14-62-15(94247)
विबुधानां गतो लोकानक्षयानात्मनिर्जितान्।
न स शोच्यस्त्वया वीरो न चान्यैः कुरुभिस्तथा॥ 14-62-16(94248)
एवं पितामहेनोक्तो धर्मात्मा स धनञ्जयः।
त्यक्त्वा शोकं महाराज हृष्टरूपोऽभवत्तदा॥ 14-62-17(94249)
पिताऽपि तव धर्मेज्ञ गर्भे तस्मिन्महामते।
अवर्धत यथाकामं शुक्लपक्षे यथा शसी॥ 14-62-18(94250)
ततः संचोदयामास व्यासो धर्मात्मजं नृपम्।
अश्वमेधं प्रति तदा ततः सोऽन्तर्हितोऽभवत्॥ 14-62-19(94251)
धर्मराजोपि मेधावी श्रुत्वा व्यासस्य तद्वचः।
वित्तोपनयने तात चकार गमने मतिम्॥ ॥ 14-62-20(94252)

इति श्रीमन्महाभारते आश्वमेधिकपर्वणि अनुगीतापर्वणि द्विषष्टितमोऽध्यायः॥ 62 ॥


Mahabharat- Hindi (Devanagari) 100000 shlokas

www.sanatanadharm.com - play store app (sanatana dharm)

"Bharathiya Sanatana Dharm" and Sanatana Dharmam & Dharmo rakshati Rakshitha logo are our trademarks. Unauthorised use of "Sanatana Dharmam & Dharmo rakshoati Rakshitha" and the logo is not allowed. Copyright © sanatanadharm.com All Rights Reserved . Made in India.